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इंदौर ट्रैफिक का बोझ अब जनता के कंधों पर सिस्टम की नाकामी को ‘सम्मान’ का तमगा

28 Apr 2026

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इंदौर ट्रैफिक का बोझ अब जनता के कंधों पर सिस्टम की नाकामी को ‘सम्मान’ का तमगा


Anam Ibrahim 

Journalist 

7771851163


जब सिग्नल थक जाएँ और सिस्टम झपकी ले तब ‘आम आदमी’ बनता है ट्रैफिक का चौकीदार!



Indore Traffic Saga: जहाँ कानून की रफ्तार सुस्त पड़ी, वहाँ अवाम को बना दिया गया ‘प्रहरी’ शील्ड, सर्टिफिकेट और कुछ लफ़्ज़ों में लिपटी एक बड़ी जिम्मेदारी, जो दरअसल सिस्टम की खामोशी का बयान है


Indore Traffic File: Law & Order की फाइलों में दर्ज ‘जनभागीदारी’, ज़मीन पर एक खामोश इक़रार ‘हमसे नहीं संभल रहा’ शील्ड, सर्टिफिकेट और कुछ तस्वीरों के पीछे छुपी एक सख़्त सच्चाई।


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Indore/Mp: इंदौर की सड़कों पर इन दिनों एक अजीब सा मंजर है। ट्रैफिक सिग्नल के नीचे खड़ा एक आम आदमी, जो कभी अपनी रोज़ीरोटी के लिए भागता था, अब ट्रैफिक संभालता दिख रहा है। नाम दिया गया है  “ट्रैफिक प्रहरी”। सुनने में जितना फख्र भरा, असल में उतना ही भारी सवालों से लदा हुआ।


पुलिस कमिश्नर संतोष कुमार सिंह के निर्देशन में चल रहे इस अभियान में अब तक 3557 नागरिक जुड़ चुके हैं। ये लोग अपने वक्त, अपनी मेहनत और कभी-कभी अपनी जान का जोखिम उठाकर चौराहों पर ट्रैफिक मैनेजमेंट में हाथ बंटा रहे हैं। और इसके एवज में मिल रहा है  एक शील्ड, एक प्रशस्ति पत्र, और कुछ तारीफों के पुल।


28 अप्रैल को कुछ चुनिंदा ‘प्रहरियों’ को सम्मानित भी किया गया। नाम पुकारे गए, तालियां बजीं, तस्वीरें खिंचीं और फिर वही पुराना सवाल हवा में तैरता रह गया 

क्या अब कानून का पहरा भी अवाम ही देगी?

Anam की तरह कहें तो....

"हाथ में झंडा नहीं, जिम्मेदारी थमा दी गई है..और इसे इनाम समझने की हिदायत भी दे दी गई है"


यह पहल जनभागीदारी के नाम पर जरूर सजाई गई है, मगर इसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही बयान करती है। क्या शहर की यातायात व्यवस्था इतनी बेबस हो चुकी है कि उसे संभालने के लिए आम आदमी को मैदान में उतारना पड़ रहा है? या फिर यह एक नर्म लहजे में कही गई सख्त हकीकत है कि सिस्टम अपने फर्ज़ से धीरे-धीरे किनारा कर रहा है?


मंटो के अफसानों की तरह यह भी एक कड़वी सच्चाई है  यहाँ किरदार बदल रहे हैं, लेकिन कहानी वही है। पुलिस की कमी, संसाधनों की तंगी, और बढ़ता ट्रैफिक इन सबका हल अब ‘प्रहरी’ बनकर जनता से ही निकलवाया जा रहा है।


बहरहाल सिस्टम ने जनता को इतना जागरूक कर दिया है कि अब वो खुद ही अपनी मुसीबतें सुलझाए, और शुक्रिया भी अदा करे।


बेशक, जो लोग इस अभियान से जुड़ रहे हैं, उनका जज़्बा काबिले-तारीफ है। मगर असली सवाल जज़्बे का नहीं, जिम्मेदारी का है। कानून व्यवस्था बनाए रखना किसका फर्ज़ है  वर्दी का या बिना वर्दी वाले उस शख्स का, जो अपने हिस्से की जिंदगी जीने निकला था?


ट्रैफिक प्रहरी अब सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि एक आईना बन चुका है जिसमें सिस्टम की थकान और जनता की मजबूरी दोनों साफ झलकती हैं।


और आखिर में, यही इबरत काफी है 

जब शहर को संभालने के लिए नागरिकों को प्रहरी बनना पड़े, तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं, असली पहरेदार सो चुका है

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