【 RNI-HIN/2013/51580 】
【 RNI-MPHIN/2009/31101 】
24 Apr 2026

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिश्तेदारी बनाम रूल ऑफ लॉ: जज की कुर्सी ने खुद को कटघरे में खड़ा किया
Anam Ibrahim
Journalist
7771851163
सर्कुलर का गला अभी सूखा भी नहीं था कि बेंच ने कलम तोड़ दी इंसाफ हुक्म से नहीं, तयसुदा उसूलों से चलता है
Jansampark Life
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अदालतें अक्सर खामोश इमारतें लगती हैं, मगर जब उनमें रिश्तों की आहट गूंजती है, तो कानून भी अपनी किताब बंद कर के आईना देखने लगता है छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ऐसा ही एक मंजर सामने आया।
मामला मामूली वैवाहिक अपील का था, लेकिन अदालत के गलियारे में अचानक ‘रिश्तेदारी’ दाखिल हो गई और वहीँ से न्यायिक असहजता (Judicial Unease) ने दस्तक दे दी। बेंच के एक जज की भतीजी, वकील के तौर पर पेश हुई जूनियर ही सही, मगर कानून की नजर में ‘रिश्ता’ कभी जूनियर नहीं होता।
कानून की किताब Advocates Act के तहत पेशेवर आचरण के उसूल स्पष्ट हैं: जहां जज और वकील के बीच करीबी रिश्ता हो, वहां पेशी नहीं, परहेज़ होना चाहिए। अदालत ने इस उसूल को सिर्फ पढ़ा नहीं, जिया।
और फिर वो हुआ, जो कम ही होता है बेंच ने खुद को अलग कर लिया।
बिना किसी ड्रामे के, मगर पूरे अदालती वज़न के साथ।
अदालत ने कहा
“विवाद की परछाई से पहले ही हम हट जाते हैं।”
ये जुमला नहीं, एक तरह का ‘ज्यूडिशियल डिस्क्लेमर’ था
कि इंसाफ सिर्फ फैसले में नहीं, फैसले से पहले के फैसले में भी होता है।
लेकिन असली तकरार उस सर्कुलर से टकराई, जो 16 अप्रैल 2026 को जारी हुआ था। मकसद नेक बताया गया बेंच हंटिंग पर लगाम। मगर तरीका ऐसा कि अदालत को ही अपने विवेक का हिसाब देना पड़े।
सर्कुलर कहता है....
“सिर्फ रिश्तेदारी के आधार पर सुनवाई से हटना, एक सामान्य नियम नहीं होगा।”
यानी अगर वकील रिश्तेदार है और केस ले चुका है, तो जज को हर बार हटना जरूरी नहीं
जब तक मामला “दुर्लभ” साबित न हो।
यहीं अदालत ने व्यंग्य की हल्की मुस्कान के साथ गंभीर सवाल दागा
क्या अब जज अपनी नैतिकता का हलफनामा भी सर्कुलर से लेंगे?
डिवीज़न बेंच ने साफ़ कहा
यह तय करना कि कौन-सी स्थिति ‘अपवाद’ है, अदालत का विशेषाधिकार है, कोई प्रशासनिक निर्देश इसे बाँध नहीं सकता।
और फिर एक वाक्य में पूरी बहस को समेट दिया
“यह सर्कुलर अदालत के कामकाज में हस्तक्षेप प्रतीत होता है।”
सच कहूं तो
यहां अदालत ने खुद को बचा लिया, वरना कानून तो पहले ही रिश्तेदार हो चुका था।
और वैसे भी सिस्टम अब इतना ईमानदार हो गया है कि उसे अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए भी आदेश जारी करने पड़ते हैं।
आखिर में, मामला चीफ जस्टिस के पास भेज दिया गया जैसे अदालत ने गेंद वापस उसी पाले में डाल दी, जहां से सर्कुलर निकला था।
खैर यह सिर्फ एक ‘रिक्यूजल’ नहीं, न्यायपालिका के भीतर चल रही उस खामोश बहस का हिस्सा है, जहां सवाल यह है
इंसाफ किताब से चलेगा, या किरदार से?
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