【 RNI-HIN/2013/51580 】
【 RNI-MPHIN/2009/31101 】
28 Feb 2026

एपस्टीन की फ़ाइलों से उठता धुआँ,दिल्ली की कुर्सियों तक पहुँची आंच नैतिकता अंडर प्रोसेस इस्तीफ़ा नॉट रिक्वायर्ड
Anam Ibrahim
Journalist
7771851163
सियासत बड़ी ही अजीब शै है, दोस्त।
जब तक नाम अख़बार में न आए, चरित्र स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है और जैसे ही कोई अंतरराष्ट्रीय फाइल खड़खड़ाती है, वही चरित्र अलleged context, मिसिंटरप्राटेशन जैसे अंग्रेज़ी लिबास पहन लेता है।
जनसम्पर्क Life
PCC /Bhopal /, Mp
महिला कांग्रेस
मामला उस अंतरराष्ट्रीय प्रकरण का है जिसे दुनिया Epstein Files के नाम से जानती है। इस वैश्विक हलचल की परछाईं अब देश की सियासत की दीवारों पर भी देखी जा रही है। नामों की फेहरिस्त में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का जिक्र सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे serious matter of public morality करार दिया है।
और फिर जो होना था, वही हुआ लोकतंत्र की सड़कें सक्रिय हो गईं।
काले वस्त्र, गरम सवाल और ठंडी सफाइयाँ
अलका लांबा के हुकुम और प्रदेश अध्यक्ष रीना बौरासी के नेतृत्व में महिला कांग्रेस कार्यकर्ता प्रदेश के चौराहों पर उतरीं।
काले वस्त्र धारण किए गएशोक का नहीं, शायद शर्म का प्रतीक। नारे लगे संविधान की चौखट के भीतर, मगर शब्दों में तीखापन ऐसा कि माइक्रोफोन भी संजीदा हो जाए।
मांग सीधी थी:
नैतिक ज़िम्मेदारी तय हो। इस्तीफ़ा दिया जाए।
राजनीति में इस्तीफ़ा अब त्यागपत्र कम, टेक्निकल टर्म ज़्यादा हो गया है जैसे फाइल को फॉरवर्ड कर देना। जवाबदेही का अर्थ अब प्रायः जांच होने दीजिए में अनुवादित हो जाता है।
पुतला जला, पर सवाल अभी भी ज़िंदा है
कई स्थानों पर पुतला दहन हुआ।
भारतीय लोकतंत्र में पुतला एक ऐसा प्रतीक है जो हर बार जलकर भी व्यवस्था को तापमान की आदत डाल देता है। राख उड़ती है, कैमरे क्लोज़-अप लेते हैं, और असली सवाल धुएँ में स्थगित हो जाता है।
रीना बौरासी ने अपने संबोधन में कहा
राजनीति में पारदर्शिता और नैतिकता सर्वोपरि होनी चाहिए। यदि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी का नाम गंभीर अंतरराष्ट्रीय प्रकरण में आता है तो उसे नैतिक आधार पर स्वयं पद छोड़ देना चाहिए।
बयान में गरिमा थी।
पर सियासत में गरिमा अक्सर भाषण तक सीमित रहती है, व्यवहार में नहीं उतरती।
नैतिकता: विभाग रहित मंत्रालय
यह प्रकरण केवल एक नाम का नहीं, एक प्रवृत्ति का है।
हमारी राजनीति में नैतिकता का कोई स्थायी मंत्रालय नहीं है। वह अवसरानुसार गठित होता है विपक्ष में हों तो प्रबल, सत्ता में हों तो स्थगित।
अगर नाम आया है तो स्पष्टीकरण सार्वजनिक हो।
अगर आरोप निराधार हैं तो तथ्यों से खंडन हो।
अगर जांच आवश्यक है तो समयबद्ध और पारदर्शी हो।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज़ आरोप नहीं होती, बल्कि चुप्पी होती है। चुप्पी, जो धीरे-धीरे अविश्वास में तब्दील हो जाती है।
आंदोलन की चेतावनी और जनता का धैर्य
महिला कांग्रेस ने संकेत दिया है कि यदि कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन व्यापक होगा।
मगर जनता का धैर्य किसी पार्टी का कार्यकर्ता नहीं होता वह हर बार सड़क पर नहीं उतरता, पर वोटिंग मशीन के सामने खामोश हिसाब ज़रूर करता है।
इबरत
सवाल यह नहीं कि कौन किस दल से है।
सवाल यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय फाइलें खुलती हैं तो क्या हमारी राष्ट्रीय नैतिकता भी खुलती है, या केवल बयान जारी होते हैं?
दोस्त, लोकतंत्र में कुर्सी बड़ी नहीं होती विश्वास बड़ा होता है।
और विश्वास, प्रेसनोट से नहीं… पारदर्शिता से कमाया जाता है।
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