【 RNI-HIN/2013/51580 】
【 RNI-MPHIN/2009/31101 】
15 Feb 2026

Supreme Court of India का ‘Abuse of Process’ Supreme Court of India का ‘Abuse of Process’ पर तंजिया फैसलापर तंजिया फैसला, जमानत के बाद जेल भेजनें की मंशा से FIR पर FIR?
Anam Ibrahim
Journalist 007
7771851163
जनसम्पर्क Life
New Delhi
Bail Order की Ink सूखी नहीं, नई FIR Ready Supreme Court ने कहा Enough is Enough
कहते हैं इंसाफ अंधा होता है मगर हमारे मुल्क में कभी कभी वो चश्मा उतार कर देख भी लेता है और देख कर पूछ बैठता है: ये FIR का serial production कब से शुरू हो गया?
Supreme Court of India ने एक अहम observation में फरमाया कि जमानत मिलने के बाद भी मुल्ज़िम को सलाखों के पीछे रखने के लिए एक के बाद एक FIR दर्ज करना “abuse of process” है यानी कानून को लाठी बनाकर इंसाफ की पीठ खुजलाना। अदालत ने साफ कहा कि यह मामला Article 32 jurisdiction के तहत दख़ल का हक़दार है।
Bench में शामिल जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने इशारों इशारों में वो बात कह दी, जिसे आम आदमी बरसों से whisper mode में कह रहा था “Bail is rule, jail is exception” लेकिन अगर exception को रोज़ का routine बना दिया जाए तो फिर संविधान को छुट्टी पर भेज देना चाहिए।
FIR का ‘Sequel Universe’
Storyline कुछ यूँ है 20 May 2025 को Ranchi ACB ने IPC और Prevention of Corruption Act, 1988 के तहत एक FIR दर्ज की। पूछताछ हुई, फाइलें खुलीं, और अचानक 2010 की कथित वन भूमि mutation case की याद ताज़ा हो गई। पंद्रह साल पुरानी याददाश्त ने ऐसी अंगड़ाई ली कि नई FIR दर्ज हो गई।
फिर 2025 में दो और FIR जैसे कोई web series हो, हर episode के अंत में “To be continued…”लिखा हो।
याचिकाकर्ता का इल्ज़ाम था कि ये सब एक well-crafted custody management strategy है ताकि जमानत का order सिर्फ कागज़ पर रहे और आरोपी ground reality में remand room की हवा खाता रहे।
Article 32: Heart & Soul या Emergency Exit?
Senior Advocate मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि alternative remedy मौजूद है, लिहाज़ा Article 32 maintainable नहीं।
मगर अदालत ने डॉ. B. R. Ambedkar के उस मशहूर बयान को याद किया जिसमें Article 32 को संविधान का “heart and soul” कहा गया था।
Court ने कहा अगर prima facie fundamental rights का उल्लंघन दिखता है, तो Article 32 कोई luxury नहीं, necessity है।
17 December 2025 को जमानत मिली, और 19 व 20 December को नई FIR में फिर police remand। अदालत ने तंजिया सादगी में कहा ये pattern बहुत कुछ बयान करता है।
यानि bail order की ink सूखने से पहले ही custody extension की नई script तैयार थी।
न्याय की नब्ज़ पर उंगली
Court ने साफ कहा:
लगातार FIR दर्ज करना और जमानत के तुरंत बाद नए मामलों में रिमांड लेना यह दर्शाता है कि अभियोजन पक्ष ने जानबूझकर यह सुनिश्चित किया कि याचिकाकर्ता हिरासत में ही रहे।
इस observation में अदालत की भाषा भले संयमित थी, मगर अर्थ बेहद कड़े थे।
Final Order: Bail Means Bail
आख़िरकार, Supreme Court ने याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी की रिहाई का आदेश दिया, साथ ही trial court की शर्तों का पालन, जांच में सहयोग और हर hearing में हाज़िरी की हिदायत भी दी।
Message crystal clear है—
जमानत के बाद FIR की बारिश कर के हिरासत को स्थायी निवास नहीं बनाया जा सकता।
बहरहाल खैर
अगर कानून किताब है, तो उसे उपन्यास मत बनाइए।
अगर FIR हक़ीक़त है, तो उसे सीरियल मत बनाइए।
और अगर संविधान “heart and soul” है, तो उसे bypass surgery की आदत मत डालिए।
वरना एक दिन अदालत को फिर कहना पड़ेगा
“जनाब, ये justice delivery system है, parcel service नहीं।”
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